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जनता का भगवाने मालिक है.... राजकुमारी

  हालांकि उनकी भाषा आम किन्नरों की तरह ही ठेंठ है. वह वैसी फूहड़ कही जानेवाली उपमा देती है और कहावत, मुहावरों का इस्तेमाल करतीं हैं जो सभ्य समाज के लोगों को नहीं पचे. उनका खास अंदाज में बात बिना बात के तालियां बजाना आपको नागवार लग सकता है, पर उनके काम को देख कर सोचना पड़ता है कि जिसे समाज ने हासिये पर डाल दिया, उसकी शारीरिक कमी को उपहास का शब्द बना दिया, उसमें समाज के प्रति इतना दर्द है तो क्यों. वह है राजकुमारी. बोकारो के रितूडीह में रहती हैं. रितूडीह के लोगों की हर जरत के समय खड़ी होती है. समाज से मिले बधाई के पैसे से वह मौज नहीं करती. उसने तीन-तीन अनाथ कही जानेवाली लड़कियों को पाला. उन्हें बड़ा किया. उनकी शादियां रचायी. उनके तीनों दामाद भी बेरोजगार हैं. उनका और उनके बच्चों का पालन-पोषण वह कर रही है. उनकी तीन बेटियों की तरह बेटा भी है. वह भी बेरोजगार है. नाती-पोते से भरा परिवार है. सबकी देखभाल वह करती है. सरकार से कुछ मदद नहीं लेतीं? सुनते ही वह भड़क जाती हैं. कहतीं हैं, कौना सरकार जी.. 12 साल होता झारखंड बनल, कतना-विधायक मिनिस्टर बनलन का भइल. सब कमा खा के लाल बाड़न. जनता बेहाल ...

झारखंड की गौरवशाली शिल्पकला ......

शिल्पकला की परंपरा भारत के इस पूर्वी क्षेत्र में झारखंड की सभ्यता-संस्कृति का गौरव है. झारखंड की शिल्पकला के काफ़ी उन्नत होने के बावजूद यहां के शिल्पकारों को उस तरह की प्रसिद्धि नहीं मिली, जिनके वे हकदार हैं. झारखंड की शिल्पकलाओं और शिल्पकारों की उन्नति के लिए झारखंड बनने के बाद सरकार की ओर से जिस तरह की सहायता की अपेक्षा की गयी, वैसा कुछ नहीं हुआ. इस कारण यहां की शिल्पकला को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह का स्थान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला. इन शिल्पकलाओं को जरूरत है, तो आर्थिक सहायता और प्रोत्साहन की. इसके अभाव में झारखंड की शिल्पकलाएं आज लुप्त होने के कगार पर हैं. पारंपरिक काष्ठकला राज्य की विभिन्न शिल्प कलाओं में लकड़ी के शिल्प (काष्ठकला) का महत्वपूर्ण स्थान है. आज इसे लोग भूलते जा रहे हैं. झारखंड के जंगलों में पहले लकड़ी भरपूर मात्रा में उपलब्ध हो जाया करती थी. लकड़ियों की उपलब्धता के कारण लोग काफ़ी संख्या में लकड़ी की वस्तुओं का निर्माण करते थे. वहीं आज लकड़ियों की किल्लत की वजह से लकड़ी की वस्तुएं कम बन रही हैं. झारखंड में बनी वस्तुओं के निर्माण में ज्यादातर अच्छ...

लुगू बुरु घांटा बाड़ी धोरोम गाढ़ ... संथालो के आराध्य देव लुगु बुरु की पूजा का स्‍थल

बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड अंतर्गत ललपनिया में स्थित आदिवासियों का ऐसा धाम है , जहां जाना हर संताड़ (आदिवासी) की ख्वाहिश होती है। प्रतिवर्ष  कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर यहां संताड़ों का जुटान होता है , यह मौका होता है लुगु बुरु घांटा बाड़ी धोरोम गाढ़ (पर्वत) में होने वाला महाधर्म सम्मेलन का।  इस महाधर्म सम्मेलन में देश के कोने-कोने से महिला-पुरुष हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित लुगु बाबा मंदिर पहुंचते है और वहा पूजा कर धर्म सम्मेलन में भाग लेते हैं। लुगु पर्वत की तलहटी में लुगू बुरु घटा बाड़ी धोरोम गाढ़ की स्थापना  30  नवंबर  2007  को की गयी ,  ताकि लुगु पर्वत पर चढ़ने का सुगम रास्ता बनाया जा सके।  इसमें न सिर्फ झारखंड के संताड़ (संथाल) अपने आराध्य देव लुगु बुरु की पूजा , बल्कि ओड़िशा , बंगाल , बिहार , छत्तीसगढ़ के संताड़ भी यहां पहुंच लुगु बुरु (पर्वत) की गुफा में स्थित देव को नमन करते हैं। हर साल लुगु बुरु महाधर्म सम्मेलन में जाने वाले सरजामदा (जमशेदपुर) के माझी बाबा जयशंकर टुडू बताते हैं कि लुगु बुरु धोरोम गाढ़ संतालियों के लिए आस्था का केन्द्...

अंग्रेजी हुकूमत में बोकारो स्थित झुमरा पहाड़ी पर होती थी चाय की खेती ....

बोकारो स्थित झुमरा पहाड़ पर माओवादियों के विरुद्ध पिछले दिनों पुलिस द्वारा चलाए गए ऑपरेशन शिखर में माओवादियों ने जहां करीब चार हजार राउंड गोलियां चलायीं, वहीं कोबरा बटालियन, झारखंड जगुआर, सशस्त्र जिला बल के जवानों, पुलिस पदाधिकारियों एवं सीआरपीएफ के जवानों ने एके 47 रायफल से 2 हजार 171 राउंड, इंसास से 396 राउंड, एसएलआर से 158 राउंड तथा 9 एमएम पिस्टल से 25 राउंड गोलियां चलायीं। पुलिस फोर्स ने एके 47, इंसास, एसएलआर, 9एमएम पिस्टल, राइफल, ग्रेनेड, एसजी राइफल, यूडीजीएल आदि हथियारों का प्रयोग किया। आज जहां नक्सलियों और पुलिस के मुठभेड़ के बाद गोलियों की केवल तड़तड़ाहट सुनाई दे रही है, उसी झुमरा पहाड़ी पर गुलाम भारत में उन्नत चाय की खेती होती थी। देश आजाद हुआ तो डालमिया उद्योग की ओर से बनने वाले अशोका ब्रांड पेपर के लिए यहां से बांस जाने लगा। चाय व बांस की खेती के लिए रामगढ़ समेत आस-पास के ग्रामीणों को मजदूरी करने के लिए यहां लाकर बसाया गया। कागज उद्योग बंद होने के बाद मजदूरी करने आए लोग यहीं बस गए। उस समय यहां रोजगार के साधन नहीं थे। फलस्वरूप लोग बकरी व मुर्गी पालन कर जीविका चलाने लगे। सड...

अंग्रेजों ने बर्मा जीतने के लिए चास (बोकारो)को बनाया था प्रशिक्षण स्थल ...

  द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बोकारो, चास और आसपास के क्षेत्र सैनिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण केन्द्र रहे। यहां थलसेना के 81 वेस्ट अफ्रीकन डिविजन, 5 माउंटेन डिविजन एवं अमेरिकी वायु सेना के 444 वें बंबार्डमेंट ग्रुप ने प्रशिक्षण हासिल किया। सभी सैनिक बर्मा में लेफ्टिनेंट जेनरल स्टिलवेल के नेतृत्व में लड़ रही मित्र राष्ट्रों की संयुक्त सेना की करारी हार के बाद यहां लाए गए थे। आजाद हिन्द फौज एवं जापानी सेना ने मित्र राष्ट्रों की संयुक्त सेना को पीछे धकेल दिया था। चास में वेस्ट अफ्रीकन डिविजन का था कैंप : चास में 81 वेस्ट अफ्रीकन डिविजन के करीब 40 हजार सैनिकों को जंगलों में युद्ध करने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया। उन्हें प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी 5वीं भारतीय डिविजन को सौंपी गयी थी जिसका नेतृत्व मेजर जेनरल हेराल्ड राडन ब्रिग्स कर रहे थे। इस डिविजन को इटालियन, जर्मन सेना, इरिट्रिया, अबीसिनिया तथा अफ्रीका के पूर्वी रेगिस्तान में जंगल में लड़ने का अनुभव था। औपनिवेशिक नीति के तहत अंग्रेजों ने बर्मा जीतने के लिए चास को प्रशिक्षण स्थल के रूप में तब्दील कर दिया। बोकारो क...

बोकारो हवाई अड्डा से उड़ान भरेगे लोग

'यात्रीगण कृपया ध्यान दें!' , 'पटना जाने के लिए विमान तैयार है!' , 'आपकी यात्रा मंगलमय हो!' , कुछ इसी तरह की आवाज अब जिले के लोग बोकारो हवाई अड्डा पर सुन सकेंगे। जी हां! जल्द ही इस हवाई अड्डे से लोग निजी हवाई यात्रा कर सकेंगे। सबसे पहले एयर डेक्कन से उनकी यात्रा शुरू होगी। यह बोकारो के इतिहास में पहला मौका होगा, जब इस हवाई अड्डे से आम लोग हवाई यात्रा का लुत्फ उठा सकेंगे। बोकारो इस्पात नगर में हवाई अड्डा तो है। लेकिन अभी तक इसका उपयोग सार्वजनिक तौर पर नहीं होता है। बीएसएल के आला अधिकारी व राजनेताओं को यहां की सुविधा मिलती रही है। इसलिए आम लोग बोकारो हवाई अड्डे से दूर ही रहे। लेकिन विकास की तीव्र रफ्तार ने बोकारो जिले की फिजा बदल दी है। यह जिला अब तेजी से इस्पात हब के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। इसलिए अब लोगों को हवाई यात्रा की भी जरूरत महसूस हो रही है। अभी तक लोग बोकारो से रांची जाकर ही हवाई यात्रा करते रहे है। जानकारी के मुताबिक समय की मांग के अनुसार अब बीएसएल प्रबंधन भी हवाई अड्डे के विस्तार की मूड में है। इस संबंध में एयर डेक्कन के साथ वार्ता ...

जा जा हो करम गोसांई..!

आदिवासियों का पारंपरिक पर्व करमा आज पूरे उत्साह व उमंग के साथ पूरे झारखंड में मनाया गया। यह पारंपरिक पर्व हरियाली का प्रतीक है। इस दिन प्रकृति की पूजा की जाती है। आज अपने पारंपरिक परिधान में आदिवासी ढ़ोल व मांडर की थाप पर थिरकते हैं। इस अवसर पर बहनें अपने भाईयों की लंबी उम्र व महिलाएं अपने पति के लिए कामना करती हैं। बहनें अपने भाईयों के लिए सुख व समृद्धि की चाहत रखती हैं। कल अपराह्न् में सभी लोग जुलूस की शक्ल में ढ़ोल-नगाड़ों के साथ पूजा स्थल पर गए। सबलोग प्रकृति के रंग में रंगे हुए थे। नाचते-गाते सड़कों पर उन्मुक्त मन से प्रकृति की पूजा की गयी। राजधानी रांची समेत झारखंड के अन्य जिलों में इस पर्व को लेकर खासा उत्साह बना होता है। जगह-जगह पर शानदार सजावट देखने को मिली , बच्चों में भी खासा उत्साह है। जा जा हो करम गोसांई, जा छोवो मास। आवोतो भादरो मास, आनोबो घुराय॥ देलियो गे करमइती, देलियो आसीस गे। तोर भइया जीयोतो, राखोतो रीति गे॥ जैसे गीतों के साथ चास-बोकारो के देहाती इलाकों में करमा पर्व की धूम थी। रविवार की रात जागरण किया गया। बहनों ने भाई की लंबी उम्र के लिए रात भर कर...