Monday, 12 December 2011

लुगू बुरु घांटा बाड़ी धोरोम गाढ़ ... संथालो के आराध्य देव लुगु बुरु की पूजा का स्‍थल


बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड अंतर्गत ललपनिया में स्थित आदिवासियों का ऐसा धाम है , जहां जाना हर संताड़ (आदिवासी) की ख्वाहिश होती है। प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर यहां संताड़ों का जुटान होता है , यह मौका होता है लुगु बुरु घांटा बाड़ी धोरोम गाढ़ (पर्वत) में होने वाला महाधर्म सम्मेलन का। इस महाधर्म सम्मेलन में देश के कोने-कोने से महिला-पुरुष हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित लुगु बाबा मंदिर पहुंचते है और वहा पूजा कर धर्म सम्मेलन में भाग लेते हैं। लुगु पर्वत की तलहटी में लुगू बुरु घटा बाड़ी धोरोम गाढ़ की स्थापना 30 नवंबर 2007 को की गयीताकि लुगु पर्वत पर चढ़ने का सुगम रास्ता बनाया जा सके। इसमें न सिर्फ झारखंड के संताड़ (संथाल) अपने आराध्य देव लुगु बुरु की पूजा , बल्कि ओड़िशा, बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़ के संताड़ भी यहां पहुंच लुगु बुरु (पर्वत) की गुफा में स्थित देव को नमन करते हैं।

हर साल लुगु बुरु महाधर्म सम्मेलन में जाने वाले सरजामदा (जमशेदपुर) के माझी बाबा जयशंकर टुडू बताते हैं कि लुगु बुरु धोरोम गाढ़ संतालियों के लिए आस्था का केन्द्र बना हुआ है। उनका मानना है कि नि:स्वार्थ भाव से यहा पूजा-अर्चना करने से लुगु बाबा की कृपा से सारी मन्नतें पूरी होती हैं। यहां भारत के अलावा नेपाल एवं बाग्लादेश से भी संताड़ी समुदाय के लोग आते हैं और लुगु पहाड़ की हजारों फीट ऊंचाई चढ़कर लुगु बाबा की पूजा-अर्चना करते हैं। पूर्व नायके (पुजारी) रहे जमशेदपुर के कन्हाई बेसरा बताते हैं कि लुगु बुरु संतालियों के आराध्य देव हैं और इनकी पूजा लुगु पहाड़ की गुफा में आर्यो के आने के पहले से ही की जाती रही है। संताड़ (आदिवासी) समुदाय के पूर्वज इसी स्थान पर रहते थे। लुगु पहाड़ की तलहटी में पूर्वजों द्वारा उपयोग में लाए गए कई अवशेष आज भी विद्यमान हैं।

सनातन धर्म में मान्यता है कि जब किसी हिन्दू की मृत्यु होती है तो उसकी अस्थि को बनारस जाकर गंगा में प्रवाहित किया जाता है, ठीक उसी प्रकार झारखंड समेत तमाम इलाकों के संताड़ समुदाय के लोगों की जब मृत्यु होती है तब उसके अस्थि को रजरप्पा की दामोदर नदी में प्रवाहित किया जाता है। लुगु बाबा के संबंध में कई पौराणिक गाथाएं भी हैं तथा उनपर कई लोकगीत भी गाए जाते हैं। पिछले वर्ष मुख्य अतिथि गुरु गोमेक चैरिटेबल ट्रस्ट राउरकेला से आये घासीराम सोरेन ने कहा कि सरना धर्म मानने वालों की आबादी अन्य धर्मो के मानने वालों से काफी अधिक है, परंतु प्रचार-प्रसार के अभाव में आज उपेक्षित है। उन्होंने कहा कि देश में 9 करोड़ से भी अधिक सरना धर्म को मानने वाले हैं।



यहां अध्यक्षता कर रहे बाबूचंद बास्के ने कहा कि सरना धर्म व हिन्दु धर्म में समानता है, फिर भी यह धर्म उपेक्षित है। उन्होंने इस धर्म को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए देश के विभिन्न राज्यों में जनजागरण अभियान चलाकर प्रचार-प्रसार करने की बात कही। साथ ही इसके प्रचार-प्रसार के लिए नीति निर्धारण किया गया। इस दौरान राउरकेला, रांची, हजारीबाग व जमशेदपुर के अलावा अन्य कई स्थानों के सरना धर्म के कई अगुवा एवं प्रचारकों ने भाग लिया। इस अवसर पर हेमंतों हेम्ब्रम, दुशारान किस्कु, गजेन्द्र किस्कु, वीरेन्द्र भगत, अनूप कुमार किडो, अनिल हांसदा, सुरेन्द्र मुर्मू, लालकिशुन मांझी, लादूराम सोरेन, संजय हांसदा, करमचंद दिया, विराम हांसदा, सुनील पाहन, शिव कच्छप, धनेश्वर हांसदा, चरकु मरांजी, भगत मार्डी, सुशीला देवी, तालो देवी सहित सैकड़ों लोगों की उपस्थिति रही। जबकि संचालन व धन्यवाद ज्ञापन विराम हांसदा ने किया।
( जागरण से साभार )

Saturday, 15 October 2011

अंग्रेजी हुकूमत में बोकारो स्थित झुमरा पहाड़ी पर होती थी चाय की खेती ....

बोकारो स्थित झुमरा पहाड़ पर माओवादियों के विरुद्ध पिछले दिनों पुलिस द्वारा चलाए गए ऑपरेशन शिखर में माओवादियों ने जहां करीब चार हजार राउंड गोलियां चलायीं, वहीं कोबरा बटालियन, झारखंड जगुआर, सशस्त्र जिला बल के जवानों, पुलिस पदाधिकारियों एवं सीआरपीएफ के जवानों ने एके 47 रायफल से 2 हजार 171 राउंड, इंसास से 396 राउंड, एसएलआर से 158 राउंड तथा 9 एमएम पिस्टल से 25 राउंड गोलियां चलायीं। पुलिस फोर्स ने एके 47, इंसास, एसएलआर, 9एमएम पिस्टल, राइफल, ग्रेनेड, एसजी राइफल, यूडीजीएल आदि हथियारों का प्रयोग किया।

आज जहां नक्सलियों और पुलिस के मुठभेड़ के बाद गोलियों की केवल तड़तड़ाहट सुनाई दे रही है, उसी झुमरा पहाड़ी पर गुलाम भारत में उन्नत चाय की खेती होती थी। देश आजाद हुआ तो डालमिया उद्योग की ओर से बनने वाले अशोका ब्रांड पेपर के लिए यहां से बांस जाने लगा। चाय व बांस की खेती के लिए रामगढ़ समेत आस-पास के ग्रामीणों को मजदूरी करने के लिए यहां लाकर बसाया गया। कागज उद्योग बंद होने के बाद मजदूरी करने आए लोग यहीं बस गए। उस समय यहां रोजगार के साधन नहीं थे। फलस्वरूप लोग बकरी व मुर्गी पालन कर जीविका चलाने लगे। सड़क नहीं होने की वजह से ये बड़ी मुश्किल से नीचे आते थे। आजादी के बाद यहां विकास के नाम पर महज प्राथमिक विद्यालय व चेक डैम बनाए गए।

महाजनी प्रथा का विरोध कर यहां उग्रवादियों ने शुरूआती दौर में अपने पांव जमाएं। भौगोलिक स्थिति की वजह से सरकार की कोई विकास योजना यहां नहीं पहुंच पायी। नक्सलियों ने इसका फायदा उठाया और यहां अपना प्रशिक्षण केन्द्र बना लिया। वर्तमान में नेपाल के बड़े नक्सली नेताओं ने भी यहां प्रशिक्षण लिया। झारखंड व बिहार के नक्सलियों को यहां हिंसा का पाठ पठाया जाने लगा। 
बोकारो के तत्कालीन एसपी केएस मीणा सबसे पहले नक्सलियों के खिलाफ मोर्चा खोला। लेकिन पुलिस को उतनी सफलता नहीं मिल पायी। इसके बाद तत्कालीन एसपी तदाशा मिश्रा ने यहां तीस कंपनी फोर्स को लेकर चढ़ाई शुरू की। झुमरा पर पहली बार राज्य शासन के आला अधिकारी उस समय पहुंचे थे।

नक्सलियों के खिलाफ अभियान चला तो पुलिस का मनोबल बढ़ा। बतौर एसपी अनिल पालटा ने झुमरा को कई बार रौंदा। बाद में बतौर डीआइजी पालटा ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल का वर्ष 2006 में कैंप स्थापित कर दिया। बल ने यहां सिविक एक्शन प्लान के तहत कुछ विकास का काम भी किया। स्थानीय लोगों से सीआरपीएफ ने सब्जी समेत अन्य सामान खरीदना शुरू कर दिया तो उनकी कुछ आमदनी भी बढ़ गयी। कई बार यहां के गांव वालों ने सड़क बनाने का अनुरोध किया। लेकिन सड़क नहीं बन सकी। आज भी यहां के लोगों को बेहतर इलाज के लिए कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है।

गोमिया विधायक सह झारखंड राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड के चेयरमैन श्री माधव लाल सिंह जी का मानना है कि झुमरा समेत आस-पास के इलाकों को उग्रवाद से मुक्त करने के लिए विकास जरूरी है। यहां सड़क, बिजली, शिक्षा व चिकित्सा का घोर अभाव है। खेती के लिए उपजाऊ भूमि है, लेकिन सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं है। लोग मेहनत से सब्जी की खेती करते हैं। लेकिन सड़क के अभाव में उसे बाजार तक नहीं पहुंचा पाते। विधान सभा में उन्होंने प्रश्न उठाया तो सरकार ने पंचमो में हाई स्कूल बनाने का भरोसा दिया। बहुत जल्द ही सड़क बनाने का भी काम शुरू कर दिया जाएगा।

अरविंद जी , बोकारो
(दैनिक जागरण से साभार)

Monday, 15 August 2011

अंग्रेजों ने बर्मा जीतने के लिए चास (बोकारो)को बनाया था प्रशिक्षण स्थल ...

 


द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बोकारो, चास और आसपास के क्षेत्र सैनिक गतिविधियों के महत्वपूर्ण केन्द्र रहे। यहां थलसेना के 81 वेस्ट अफ्रीकन डिविजन, 5 माउंटेन डिविजन एवं अमेरिकी वायु सेना के 444 वें बंबार्डमेंट ग्रुप ने प्रशिक्षण हासिल किया। सभी सैनिक बर्मा में लेफ्टिनेंट जेनरल स्टिलवेल के नेतृत्व में लड़ रही मित्र राष्ट्रों की संयुक्त सेना की करारी हार के बाद यहां लाए गए थे। आजाद हिन्द फौज एवं जापानी सेना ने मित्र राष्ट्रों की संयुक्त सेना को पीछे धकेल दिया था।
चास में वेस्ट अफ्रीकन डिविजन का था कैंप : चास में 81 वेस्ट अफ्रीकन डिविजन के करीब 40 हजार सैनिकों को जंगलों में युद्ध करने के लिए विशेष रूप से प्रशिक्षित किया गया। उन्हें प्रशिक्षित करने की जिम्मेदारी 5वीं भारतीय डिविजन को सौंपी गयी थी जिसका नेतृत्व मेजर जेनरल हेराल्ड राडन ब्रिग्स कर रहे थे। इस डिविजन को इटालियन, जर्मन सेना, इरिट्रिया, अबीसिनिया तथा अफ्रीका के पूर्वी रेगिस्तान में जंगल में लड़ने का अनुभव था। औपनिवेशिक नीति के तहत अंग्रेजों ने बर्मा जीतने के लिए चास को प्रशिक्षण स्थल के रूप में तब्दील कर दिया। बोकारो का इतिहास नामक पुस्तक के लेखक शिक्षाविद् अनिल कुमार गुप्ता एवं जीत पांडेय के अनुसार प्रशिक्षण के बाद इन डिविजनों को 14वीं ब्रिटिश आर्मी में शामिल किया गया। फरवरी 1944 में इस ब्रिटिश टुकड़ी ने दोबारा बर्मा में जापानियों पर आक्रमण किया। इसमें रॉयल एयर फोर्स का सहयोग रहा। जमीनी सेना में 5वीं एवं 25वीं इंडियन डिविजन शामिल थी। मायू पहाड़ी पर 5वीं बटालियन ने कब्जे का प्रयास किया लेकिन वे असफल रहे। बाद में इस पहाड़ी पर 81वीं वेस्ट अफ्रीकन डिविजन की मदद से कब्जा किया गया। 81वीं वेस्ट अफ्रीकन डिविजन में नाइजीरिया, सियेरा लियोन एवं नामीबिया के सैनिक शामिल थे। यह डिविजन 14 अगस्त 1943 को भारत पहुंची थी। इस डिविजन ने बर्मा (म्यांमार) में दूसरे अराकान मिशन में फरवरी 1944 से मई 1944 तक कालादान घाटी युद्ध में हिस्सा लिया। इसके अलावा 5वीं माउंटेन डिविजन ने भी चास में प्रशिक्षण लिया था। जून 1943 में यह डिविजन चास पहुंची, जहां इसने जंगल में युद्ध करने का विशेष प्रशिक्षण लिया। इस सैन्य टुकड़ी ने भी बर्मा में टिड्डिम युद्ध में हिस्सा लिया और पहली बार किसी जापानी टुकड़ी को दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हराया।
खंडहर कहते हैं कहानी : चास में प्रशिक्षण के दौरान बनाए गए अधिकांश भवन अब खंडहर में बदल गए हैं। ये सभी द्वितीय विश्वयुद्ध की कहानी बयां करते हैं। पिण्ड्राजोरा में एक बड़ा कैंप अथवा मुख्यालय बनाया गया था। पेयजल के लिए जगह-जगह टंकियां बनायी गयी थीं। प्रशिक्षण के लिए बनाए गए भवन दामोदर नदी के तेलमच्चो पुल, पिण्ड्राजोरा, गवई नदी, कुरा एवं ओबरा आदि के पास धनबाद-पुरुलिया रोड पर हैं। पिण्ड्राजोरा से 5 किमी आगे पुरुलिया रोड पर सैनिकों के लिए रेक्स सिनेमा हॉल बनाया गया था। गवई नदी से लगभग दो किमी की दूरी पर सैनिकों का एक कब्रिस्तान अभी तक सुरक्षित है। गवई नदी के तट पर ही एक वाटर फिल्टर प्लांट का अवशेष है। वाहनों के रखरखाव के लिए बनाए गए कुछ प्लेटफार्म भी अब तक सुरक्षित हैं। ओबरा में 50 कमरों का एक मुख्यालय और एक सैनिक अस्पताल था। इन भवनों में 1948 में टीचर्स ट्रेनिंग स्कूल, छात्रावास एवं बुनियादी स्कूल खोले गए।

श्री राम मूर्ति प्रसाद  , द्वारा जागरण में प्रकाशित आलेख