Tuesday, 17 April 2012

Pujya Tapaswi Sri Jagjivanjee Maharaj Chakchu Chikitsalaya, Petarbar


Pujya Tapaswi Sri Jagjivanjee Maharaj Chakchu Chikitsalaya, Petarbar is a Charitable Eye Hospital which today sets an example of a selfless service to the society by a noble organization, the inspiration of Shree Jayant Muniji Maharaj under whose supervision the hospital was established way back in 1981. It was then, when He had finally decided to serve the needy persons of the Tribal area of Jharkhand after having wandered vast stretches of land throughout the country as a Jain Saint.

Pujya Tapaswi Sri Jagjivanjee Maharaj Chakchu chikitsalaya Trust is mainly running the hospital in petarbar, a small place with mainly tribal and backward population located on the way from Bokaro to Ramgarh, as a huge organization well equipped with the latest technologies and facilities including the ones like Phocoemulsification, Corneal Grafting, B-Scanning and Laser Units.

The financial needs and requirements of the organizationare readily satisfied by the donations in the state, country and abroad. The donations for the hospital are exempted U/S 35 AC & 80G of Income Tax Act. The hospital is also registered under Foreign Contribution Regulation Act to receive donations in foreign countries.

The achievements and works of the organization undoubtedly reflects its humanitarian motto of service to mankind. A brief note on the nature of activities carried out and the area of work done by the organization are given below.....

Eye Hospital - The organization is running a charitable eye hospital in tribal and rural areas within 200kms. with its unique and miraculous work e.g. Eye Bank, Corneal Transplantation, Cataract Surgery, Intraoccular Lense Implantation, Phacoemulsification etc. for which no charges is paid by the beneficieries. During the period of stay at the hospital for operation, accomodation, medicine, food, operation, Lens, postoperative care, dressing and spectacles are provided free of cost to the patients. Free medicines are also provided to outdoor patients.

The hospital also organizes free eye checkup camps at schools and villages for giving eye treatment to needy and poor people of this adivasi tribal area.

The hospital now holds a proud record of having operated more than 35000 cataract operations and performing numerous I.O.Ls including Phacoemulsification with foldable I.O.L. and Glaucoma operations. Also about 3,50,000 patients have been given relief by outdoor checkups.

THE PERFORMANCE REPORT OF THE HOSPITAL FOR THE LAST THREE YEARS----
{| class="wikitable"
|-
! Year !! UOTDOOR PATIENT !! CATARACT OP.(ICCE) !! CATARACT OP.(I.O.L.&PHACO) !! MINOR OP.
|-
| 2008-2009 || 17379 || 23 || 978 || 82
|-
| 2009-2010 || 17673 || 00 || 1324 || 292
|-
| 2010-2011 || 19774 || 00 || 1553 || 466

|}

2. EYE BANK --- The organization has also established an EYE BANK named 'PIYUSH EYE BANK' so as to regularly perform corneal transplantation by playing a leading role in the entire state of Bihar , Bengal and Jharkhand. The hospital has restored vision of 28 number of blind persons till now and a number of people have already registered themselves for this noble cause.

3. DENTAL DEPARTMENT --- The organization is also running a dental department as there is no arrangement in and around petarbar to treat dental patients. The hospital is fully equipped for giving free dental treatment with Dentist Chair and all necessary instruments.

4. EMERGENCY MEDICAL TREATMENT AND TRANSPORTATION -- There is no modern hospital in petarbar and many times serious and accidental patients need emergency medical/surgical treatment then hospital provides them ambulence facilities to nearby hospital at Ranchi and Bokaro. They maintain a ready supply of Oxygen Gas Cylinder, which has saved many human lives.

5. EDUCATION--- Besides the medical activities SHREE JAYANT MUNIJI's divine inspiration for the 'NETRA JYOTI' turned his vision to 'GYAN JYOTI' by undertaking education. One primary and one High School with hostel in Rajgir, Bihar, One school having classes upto 10+2 with 1500 students at Bokaro Steel City, One school at petarbar with 500 students and many small schools in interior villages are being run. All in the name of 'Pujya Tapaswi Jagjivanjee Maharaj'

The organization has also started a 'Smt. Pushpa Devi Jain Scholarship Fund' so that all the needy children from backward classes can be given education in their school through matchindg scholarship. Their motto is to ensure that no deserving poor student is deprived of the valueable education because of lack of fund.

6. DISTRIBUTION OF TRI CYCLE --- The organization also distributes tricycle to the handicapped poor people. 56 no. of tricycles have been distributed and in near future the organization is going to provide artificial limbs and calipers to the handicapped.

7. DISTRIBUTION OF WOOLEN SWEATER & BLANKETS ---- The organization also distributes woolen sweater, blankets etc. to the poor and needy people in this region in winter.

8. BAL BHOJ ---- The organization has also been serving sweets, fruits and food to about 600 to 700 numbers every months to the poor children for the last 25 years.

9. COW DISTRIBUTION --- Under Gow Dan scheme, the organization distributes cows among the poor vegetarian families for their livelihood. 101 nos. of cows have been distributed.

10. VILLAGE DEVELOPMENT PROGRAMME ---- The organization has adopted a village 'RUKAM' for all basic development.

Saturday, 31 March 2012

बोकारो आये थे भगवान श्रीराम ! .. - रामनवमी पर विशेष -


शीर्षक पढ़ कर चौंकना लाजिमी है! मगर धार्मिक मान्यता है कि मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम त्रेता युग में बोकारो आये थे. हालांकि त्रेता युग में बोकारो का क्या स्वरूप रहा होगा, इसकी कल्पना मात्र की जा सकती है.
बावजूद इसके वर्तमान बोकारो के विभिन्न स्थलों पर उनके आने के अलग-अलग प्रसंग की जनश्रुतियां हैं. इन सभी स्थलों का विशेष धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व है. यूं कहें, इन्हें धरोहर के रूप में संजो कर रखा गया है. मुख्यत: जिले के तीन स्थलों पर भगवान श्रीराम के आने की मान्यता है. इनमें दो स्थल कसमार व एक चास प्रखंड में है.
बारनी घाट में किया था स्नान : चास-धनबाद मुख्य पथ पर पानी टंकी से करीब 10 किमी दूर पूरब दिशा स्थित कुम्हरी पंचायत में दामोदर नदी पर बारनी घाट है. कहा जाता है-वनवास के दौरान पत्नी सीता व भाई लक्ष्मण के साथ भगवान श्रीराम कुम्हरी होकर गुजरे थे.
वह वनवास का 12वां वर्ष और चैत माह की 13वीं तिथि थी. रात्रि विश्राम के बाद सुबह रवाना होने से पहले भगवान राम ने पत्नी व भाई के साथ बारनी घाट में स्नान किया था. इसे पकाहा दह के नाम से भी जाना जाता है. ग्रामीणों के अनुसार, लगभग दो हजार वर्ग फ़ुट में फ़ैले इस दह की गहराई का लगाना मुश्किल था. अब गहराई काफ़ी कम है. हालांकि, भीषण गरमी और सुखाड़ में भी इसमें लबालब पानी रहता है.
कई पौराणिक पत्थर और चरण पादुका भी हैं. इसे भगवान राम के होने की बात कही जाती है. इस स्थल का महत्व हरिद्वार, त्रिवेणी और पुष्कर की तरह है. जिस तिथि को श्रीराम ने यहां स्नान किया था, प्रत्येक साल उस तिथि में स्नान करने श्रद्धालु उमड़ पड़ते हैं. लोगों का मानना है कि इससे पुण्य की प्राप्ति और पितरों को मुक्ति मिलती है.
मृग खोह में स्वर्ण मृग की तलाश : कसमार प्रखंड की मंजूरा पंचायत में राम-लखन टुंगरी व हिसीम पंचायत में डुमरकुदर गांव के पास मृग खोह स्थित है. दोनों जगहों पर श्रीराम के आने का प्रसंग एक-सा है. कहा जाता है-माता जानकी की जिद पर स्वर्ण मृग की तलाश में भगवान राम इन दोनों जगहों पर आये थे. मृग खोह की पहाड़ी पर जिस जगह तीर चलाये थे, वहां से दूध की धारा निकल पड़ी थी.
कहा जाता है, एक चरवाहा की शरारत के कारण दूध धारा पानी में तब्दील हो गयी. यहां दो जगहों पर भगवान राम के पदचिह्न हैं. पहाड़ी के कुछ नीचे हिस्से पर स्थित पदचिह्न पर मंदिर का निर्माण हुआ है.
दूसरा पदचिह्न पहले से करीब 200 फुट की ऊंचाई पर है. यहां प्रत्येक साल मकर संक्रांति पर विशाल टुसू मेला लगता है. मरीच वध का आयोजन होता है. राम-लखन टुंगरी के बारे में भी ठीक ऐसी ही मान्यता है.
यहां भी पदचिह्न पर मंदिर का निर्माण हुआ है. पहाड़ी की एक बड़ी चट्टान, जहां तीर टकराया था, पर से जल धारा निकलती है. इन स्थलों पर सालों भर लोग दर्शन-पूजन के लिए पहुंचते हैं. दूसरी ओर, उक्‍त तीनों स्थलों के विकास के लिए सरकारी स्तर पर काम नहीं हुआ है.
दीपक सवाल 
'प्रभात खबर' से साभार

Sunday, 4 March 2012

बोकारो के इमरान जाहिद ..निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट की फिल्म जिस्‍म दो में मुख्‍य भूमिका में


बोकारो के इमरान जाहिद न तो इंजीनियर बनना चाहते थे और न ही डॉक्टर। वे कुछ अलग करना चाहते थे। स्कूल के दिनों में वे फिल्म देखते थे, बस यहीं से फिल्मी हीरो बनने की धुन सवार हो गयी। मेहनत व लगन की बदौलत इस छोटे से शहर से निकल कर फिल्मी जगत में कदम रख दिया। प्रख्यात फिल्म निर्माता-निर्देशक महेश भट्ट की फिल्म जिस्म दो में इमरान मुख्य भूमिका में हैं। इनके साथ सनी लियोन, रणदीप हुडा व अरुणोदय सिंह भी इस फिल्म में काम कर रहे हैं। 1 अप्रैल को फिल्म की शूटिंग जयपुर में शुरू होगी।
इमरान जाहिद ने दूरभाष पर जागरण को बताया कि डीएवी पब्लिक स्कूल सेक्टर चार से 12वीं की परीक्षा उत्तीर्ण कर वे दिल्ली गए। यहां हिन्दू कॉलेज से बीकॉम आनर्स किया। इसके बाद यहां मास कम्युनिकेशन सेंटर खोला। थियेटर में इनकी रुचि बनी रही। पांच वर्ष पूर्व दुबई में महेश भट्ट से भेंट हुई। श्री भट्ट ने इनकी काबिलियत को परखा और अपने नाटक लास्ट सैल्यूट में जगह दी।
इमरान ने इस नाटक में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जार्ज बुश के ऊपर जूता फेंकने वाले मुन्तजर अल जैदी की भूमिका अदा की। दिल्ली, कोलकाता, मुम्बई सहित देश के अन्य शहरों में इस नाटक का मंचन किया गया। इसके बाद महेश भट्ट ने इन्हें जन्नत दो में चांस दिया। इसमें इन्होंने पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका अदा की। अब जिस्म दो में मुख्य भूमिका निभाएंगे। इसका निर्देशन पूजा भट्ट करेंगी। उन्होंने बताया कि वे महेश भट्ट को लेकर बोकारो आएंगे। यहां लास्ट सैल्यूट का मंचन किया जाएगा। वे बोकारो में फिल्म अकादमी खोलने का पूरा प्रयास करेंगे।
इमरान ने बताया कि पिता सेक्टर नौ बी स्ट्रीट 14 आवास संख्या 771 निवासी पूर्व इस्पातकर्मी एसजी जाहिद एवं माता शाहिना जाहिद ने उसका कुशल मार्गदर्शन किया। माता-पिता ने उसे यह बताया कि जमीन से जुड़े रहने से आपको फायदा है। महेश भट्ट भी चमक से दूर बहुत साधारण व बेसिक आदमी हैं। वे अपने आप में एक इंस्टीच्यूशन हैं। महेश भट्ट से मिलना ही लक्ष्य पाने के समान है।
(जागरण से साभार)

Monday, 6 February 2012

जनता का भगवाने मालिक है.... राजकुमारी

 हालांकि उनकी भाषा आम किन्नरों की तरह ही ठेंठ है. वह वैसी फूहड़ कही जानेवाली उपमा देती है और कहावत, मुहावरों का इस्तेमाल करतीं हैं जो सभ्य समाज के लोगों को नहीं पचे. उनका खास अंदाज में बात बिना बात के तालियां बजाना आपको नागवार लग सकता है, पर उनके काम को देख कर सोचना पड़ता है कि जिसे समाज ने हासिये पर डाल दिया, उसकी शारीरिक कमी को उपहास का शब्द बना दिया, उसमें समाज के प्रति इतना दर्द है तो क्यों.
वह है राजकुमारी. बोकारो के रितूडीह में रहती हैं. रितूडीह के लोगों की हर जरत के समय खड़ी होती है. समाज से मिले बधाई के पैसे से वह मौज नहीं करती. उसने तीन-तीन अनाथ कही जानेवाली लड़कियों को पाला. उन्हें बड़ा किया. उनकी शादियां रचायी. उनके तीनों दामाद भी बेरोजगार हैं.
उनका और उनके बच्चों का पालन-पोषण वह कर रही है. उनकी तीन बेटियों की तरह बेटा भी है. वह भी बेरोजगार है. नाती-पोते से भरा परिवार है. सबकी देखभाल वह करती है. सरकार से कुछ मदद नहीं लेतीं? सुनते ही वह भड़क जाती हैं. कहतीं हैं, कौना सरकार जी.. 12 साल होता झारखंड बनल, कतना-विधायक मिनिस्टर बनलन का भइल. सब कमा खा के लाल बाड़न. जनता बेहाल बिया. व्यवस्था पर चोट करती हैं.
कहती हैं, इहा के पुलिस के का कहब. केहू मार के ककरो कपार फोड़ देलस. पुलिस कपार फोड़ वाला के ना पकड़ी. जेकर कपार फूटल ओकरे धर के जेहल भेज दिही. लोग पानी बिना परेशान बा. केहू आवत नइखे. वोटवा के टैम आइ तऽ सब केहू आके दुआरी पर भीड़ लगा दिहन. राजकुमारी के तब सबके याद आवेला. देखीं तऽ पोतवा के स्कूल फीस बाकी बा. आठ हजार देवे पड़ी. एकर कौन ना तो टीबी भइल बा, बीजीएच में भरती करे पड़ी. पैसवा होई तब ना इ कुल्ही होई..का कहीं सैकड़ा में सूद पर पैसा लेले बानी, उहे भरत बानी.
- कई लड़कियों की शादी करायी : उसके पास बधाई के ही पैसे आते हैं. उन पैसों से वह जरत मंद की मदद करती हैं. कई शादियां करायी है. रितूडीह में बजरंग बली का मंदिर बनवाया है. यहां हर साल यज्ञ करवाती हैं. मकर संक्रांति के दिन पांच सौ साड़ियां, शॉल और कंबल गरीब-गुरबों को नियमित तौर पर बांटती हैं. खुद एक झोंपड़ी में रहती हैं. मामूली सूती साड़ी पहनती हैं.
इसके बाद जहां भी कोई समस्या होती हैं वहां जाती है. कई बार गुंडे-बदमाशों से सामना कर चुकी हैं. उनके सामाजिक कार्यो का परिणाम है कि आज उनके पीछे हजारों की संख्या में महिलाएं खड़ी होती हैं. उसने रीतूडीह से जिसे मुखिया बनाने के लिए लोगों से कहा वह जीता. मगर, राजकुमारी कहती हैं..इ तो महा बेईमान निकला जी. इहे तो रोना है, जो जीता उहे बेईमान. जनता का भगवाने मालिक है.
- कई सवाल इनके काम से -
* क्या सभ्य समाज के ठेकेदार वही होंगे जो बात तो उम्दा किस्म का करते हैं, अपने भाषण-आचरण से लोगों को प्रभावित कर जनता का प्रतिनिधि बनते हैं और राजकुमारी के शब्दों में वे बेईमान हो जाते हैं.
* क्या राजकुमारी जैसे लोगों को फूहड़ कह कर उनके समाज के प्रति योगदान को नकार देना चाहिए.
* क्या यह मानना सही होगा कि सिर्फ पढ़े-लिखे लोग ही समाज की भलाई की बात सोचा करते हैं. क्या वे रितूडीह जैसी झोंपड़ पट्टी में जाकर काम करना मुनासिब समझेंगे. यहां की भाषा, तौर-तरीके को वह मन से कबूल कर सकते हैं.
* क्या नेताओं और जन प्रतिनिधियों के बारे में राजकुमारी की बात का नोटिस लोग लेंगे.
(दैनिक जागरण से साभार )

Monday, 16 January 2012

झारखंड की गौरवशाली शिल्पकला ......




शिल्पकला की परंपरा भारत के इस पूर्वी क्षेत्र में झारखंड की सभ्यता-संस्कृति का गौरव है. झारखंड की शिल्पकला के काफ़ी उन्नत होने के बावजूद यहां के शिल्पकारों को उस तरह की प्रसिद्धि नहीं मिली, जिनके वे हकदार हैं. झारखंड की शिल्पकलाओं और शिल्पकारों की उन्नति के लिए झारखंड बनने के बाद सरकार की ओर से जिस तरह की सहायता की अपेक्षा की गयी, वैसा कुछ नहीं हुआ. इस कारण यहां की शिल्पकला को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह का स्थान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला. इन शिल्पकलाओं को जरूरत है, तो आर्थिक सहायता और प्रोत्साहन की. इसके अभाव में झारखंड की शिल्पकलाएं आज लुप्त होने के कगार पर हैं.
पारंपरिक काष्ठकला
राज्य की विभिन्न शिल्प कलाओं में लकड़ी के शिल्प (काष्ठकला) का महत्वपूर्ण स्थान है. आज इसे लोग भूलते जा रहे हैं. झारखंड के जंगलों में पहले लकड़ी भरपूर मात्रा में उपलब्ध हो जाया करती थी. लकड़ियों की उपलब्धता के कारण लोग काफ़ी संख्या में लकड़ी की वस्तुओं का निर्माण करते थे. वहीं आज लकड़ियों की किल्लत की वजह से लकड़ी की वस्तुएं कम बन रही हैं. झारखंड में बनी वस्तुओं के निर्माण में ज्यादातर अच्छी किस्म की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. लकड़ी से बनी वस्तुएं अपनी उपयोगिता और सुंदरता के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है. अलमारी, दरवाजे और खिड़कियों पर सुंदर कलाकृतियां उकेरी जाती हैं. ये कलाकृतियां लकड़ी की सख्त सतह पर काफ़ी आकर्षक रूप से बनायी जाती हैं.

इसके अलावा घरों में रोजाना उपयोग में आनेवाली वस्तुओं का भी निर्माण लकड़ी से किया जाता है. लकड़ी के चम्मच, बक्से आदि भी बनाये जाते हैं. लकड़ी से बनी वस्तुओं की भारत के अलावा विदेशों में भी काफ़ी मांग है इसलिए झारखंड की लकड़ी शिल्पकला को बचाने और कारीगरों दक्षता लाने की जरूरत है. झारखंड में इस शिल्पकला को जिस तरह की पहचान मिली है वह इस शिल्प से जुड़े कामगारों के लिए पर्याप्त नहीं है. इसके लिए इन कामगारों को बाजार के अनुसार व्यवसायिक होने की जरूरत है. बाजारों में लकड़ी के बाजार भाव की जानकारी न होने की वजह से यह शिल्पकला उपेक्षित है. इस शिल्पकला को झारखंड सरकार की ओर से प्रोत्साहन की जरूरत है.
बांस शिल्पकला
झारखंड में जिस तरह के बांसों की प्रजातियां मिलती हैं, उससे यहां के शिल्पकारों द्वारा बनायी गयी बांस की वस्तुओं की अलग पहचान है. झारखंड की बांस की कला पूरे देश में अनोखी है. स्थानीय बांस से कुछ खास समुदाय के लोग नक्काशी करके बांस शिल्प का अच्छा नमूना पेश करते हैं. स्थानीय लोग बांस से टोकरियां, मछली पकड़ने और शिकार करने की वस्तुएं बनाते हैं. यहां की बांस की प्रजाति मोटी नहीं है, इसके बावजूद यहां के शिल्पकार इन बांसों में अद्भुत नक्काशी करते हैं. इस शिल्पकला पर यदि सरकार ध्यान दे, तो यह कला पूरे देश में विख्यात हो सकती है.
पैतकार पेंटिंग्स
पैतकार झारखंड के संस्कृति की एक महत्वपूर्ण कला है. यह कला मुख्यत: बंगाली समुदाय की देवी मनसा से जुड़ी हुई है. पैतकार यहां के समुदायों के सामाजिक मान्यता से जुड़ी हुई है. पैतकर पेंटिंग्स को झारखंड में स्थानीय लोग घुमावदार पेंटिंग्स के रूप से जानते हैं. इस पेंटिंग को उसे बनाये जाने की प्रकृति के अनुसार नाम दिया गया है. इस पेंटिंग में मनुष्य के मृत्यु के बाद के जीवन को विभिन्न रंगों के माध्यम से दर्शाया जाता है. इस पेंटिंग की हालत भी अन्य शिल्पकलाओं की तरह दम तोड़ रही है. इसकी खास वजह है कि इसे जानने वाले लोग इसके प्रचार-प्रसार में रूचि नहीं लेते. इस पुराने कला पर सरकार का ध्यान जाना चाहिए. इस वजह से पैतकार पेंटिंग कला को लोग भूल जायेंगे और यह इतिहास की बात बन जायेगी.
धातु कला
पूरे झारखंड में धातु कला सबसे ज्यादा प्रचलित है. यहां के धातु निर्मित औजार, हथियार और अन्य वस्तुएं उपयोग के लिए काफ़ी अच्छी मानी जाती है. धातु निर्माण का कार्य झारखंड के तेंतरी और मल्हार जाति के लोग ही करते हैं. धातु के वस्तुओं में हथियार, गहने, शिकार के औजार और खेती के औजार बनाये जाते हैं. गहनों के निर्माण के लिए शिल्पकार सोने और चांदी का उपयोग करते हैं. इस जनजाति के लोग धातु निर्माण के कार्य में अपनी उपयोगिता पूरे राज्य में साबित कर चुके हैं. धातु शिल्प के कार्यो में ज्यादातर आदिवासी लोग ही लिप्त हैं, इस कारण औद्योगिक नीति से अपने कला का प्रचार-प्रसार नहीं कर पा रहे हैं.
पत्थरों पर नक्काशी
यहां के कलाकार पत्थरों पर सुंदर कलाकृतियों का रूप उकेरते हैं. इनके कार्यो को पहचाने जाने की जरूरत है. किंतु यह इस कला का दुर्भाग्य ही है कि पत्थरों में नक्काशी को जरूरत के अनुसार सहायता और स्थान नहीं मिला है. राज्य में जहां-जहां पत्थरों पर नक्काशी के उदाहरण मिले हैं, वे अधिकतर स्थानीय आदिवासी समुदायों द्वारा बनाये गये हैं. इनके पास अच्छे उपकरणों और सरकार की ओर से प्रोत्साहन देने की जरूरत है. तभी पत्थर शिल्पकला नयी ऊंचाइयां छू पायेगी.
झारखंड के गहने
पारंपरिक झारखंडी गहनों का निर्माण आदिवासी समुदाय के लोग स्वयं करते हैं. गले, कान, नाक और हाथ में पहने जानेवाले गहनों का निर्माण वैसे तो सोने और चांदी से किया जाता है. इसके बावजूद यहां के लोग कीमती पत्थरों और मोती या मनकों से बने होते हैं. इनके द्वारा बनाये गये गहने आसानी से बनाये जाते हैं और इनको बनाने की विधि जटिल भी नहीं है. गहने बनाने की कला को यदि व्यावसायिक दृष्टि से प्रोत्साहन दिया जाये, तो यहां के गहने काफ़ी प्रचलित हो सकते हैं.
कठपुतली कला
झारखंड में लकड़ी से बने कठपुतली बनाने के लिए किसी खास वैज्ञानिक पद्धति की जरूरत नहीं पड़ती. इसे सामान्य तरीके से बनाया जाता है. कठपुतलियों को आकर्षक रंगों से बनाया जाता है. कठपुतलियों को रस्सी के सहारे हिलाया-डुलाया जाता है.
(प्रभात खबर से साभार )

Monday, 12 December 2011

लुगू बुरु घांटा बाड़ी धोरोम गाढ़ ... संथालो के आराध्य देव लुगु बुरु की पूजा का स्‍थल


बोकारो जिले के गोमिया प्रखंड अंतर्गत ललपनिया में स्थित आदिवासियों का ऐसा धाम है , जहां जाना हर संताड़ (आदिवासी) की ख्वाहिश होती है। प्रतिवर्ष कार्तिक पूर्णिमा के मौके पर यहां संताड़ों का जुटान होता है , यह मौका होता है लुगु बुरु घांटा बाड़ी धोरोम गाढ़ (पर्वत) में होने वाला महाधर्म सम्मेलन का। इस महाधर्म सम्मेलन में देश के कोने-कोने से महिला-पुरुष हजारों फीट की ऊंचाई पर स्थित लुगु बाबा मंदिर पहुंचते है और वहा पूजा कर धर्म सम्मेलन में भाग लेते हैं। लुगु पर्वत की तलहटी में लुगू बुरु घटा बाड़ी धोरोम गाढ़ की स्थापना 30 नवंबर 2007 को की गयीताकि लुगु पर्वत पर चढ़ने का सुगम रास्ता बनाया जा सके। इसमें न सिर्फ झारखंड के संताड़ (संथाल) अपने आराध्य देव लुगु बुरु की पूजा , बल्कि ओड़िशा, बंगाल, बिहार, छत्तीसगढ़ के संताड़ भी यहां पहुंच लुगु बुरु (पर्वत) की गुफा में स्थित देव को नमन करते हैं।

हर साल लुगु बुरु महाधर्म सम्मेलन में जाने वाले सरजामदा (जमशेदपुर) के माझी बाबा जयशंकर टुडू बताते हैं कि लुगु बुरु धोरोम गाढ़ संतालियों के लिए आस्था का केन्द्र बना हुआ है। उनका मानना है कि नि:स्वार्थ भाव से यहा पूजा-अर्चना करने से लुगु बाबा की कृपा से सारी मन्नतें पूरी होती हैं। यहां भारत के अलावा नेपाल एवं बाग्लादेश से भी संताड़ी समुदाय के लोग आते हैं और लुगु पहाड़ की हजारों फीट ऊंचाई चढ़कर लुगु बाबा की पूजा-अर्चना करते हैं। पूर्व नायके (पुजारी) रहे जमशेदपुर के कन्हाई बेसरा बताते हैं कि लुगु बुरु संतालियों के आराध्य देव हैं और इनकी पूजा लुगु पहाड़ की गुफा में आर्यो के आने के पहले से ही की जाती रही है। संताड़ (आदिवासी) समुदाय के पूर्वज इसी स्थान पर रहते थे। लुगु पहाड़ की तलहटी में पूर्वजों द्वारा उपयोग में लाए गए कई अवशेष आज भी विद्यमान हैं।

सनातन धर्म में मान्यता है कि जब किसी हिन्दू की मृत्यु होती है तो उसकी अस्थि को बनारस जाकर गंगा में प्रवाहित किया जाता है, ठीक उसी प्रकार झारखंड समेत तमाम इलाकों के संताड़ समुदाय के लोगों की जब मृत्यु होती है तब उसके अस्थि को रजरप्पा की दामोदर नदी में प्रवाहित किया जाता है। लुगु बाबा के संबंध में कई पौराणिक गाथाएं भी हैं तथा उनपर कई लोकगीत भी गाए जाते हैं। पिछले वर्ष मुख्य अतिथि गुरु गोमेक चैरिटेबल ट्रस्ट राउरकेला से आये घासीराम सोरेन ने कहा कि सरना धर्म मानने वालों की आबादी अन्य धर्मो के मानने वालों से काफी अधिक है, परंतु प्रचार-प्रसार के अभाव में आज उपेक्षित है। उन्होंने कहा कि देश में 9 करोड़ से भी अधिक सरना धर्म को मानने वाले हैं।



यहां अध्यक्षता कर रहे बाबूचंद बास्के ने कहा कि सरना धर्म व हिन्दु धर्म में समानता है, फिर भी यह धर्म उपेक्षित है। उन्होंने इस धर्म को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने के लिए देश के विभिन्न राज्यों में जनजागरण अभियान चलाकर प्रचार-प्रसार करने की बात कही। साथ ही इसके प्रचार-प्रसार के लिए नीति निर्धारण किया गया। इस दौरान राउरकेला, रांची, हजारीबाग व जमशेदपुर के अलावा अन्य कई स्थानों के सरना धर्म के कई अगुवा एवं प्रचारकों ने भाग लिया। इस अवसर पर हेमंतों हेम्ब्रम, दुशारान किस्कु, गजेन्द्र किस्कु, वीरेन्द्र भगत, अनूप कुमार किडो, अनिल हांसदा, सुरेन्द्र मुर्मू, लालकिशुन मांझी, लादूराम सोरेन, संजय हांसदा, करमचंद दिया, विराम हांसदा, सुनील पाहन, शिव कच्छप, धनेश्वर हांसदा, चरकु मरांजी, भगत मार्डी, सुशीला देवी, तालो देवी सहित सैकड़ों लोगों की उपस्थिति रही। जबकि संचालन व धन्यवाद ज्ञापन विराम हांसदा ने किया।
( जागरण से साभार )

Saturday, 15 October 2011

अंग्रेजी हुकूमत में बोकारो स्थित झुमरा पहाड़ी पर होती थी चाय की खेती ....

बोकारो स्थित झुमरा पहाड़ पर माओवादियों के विरुद्ध पिछले दिनों पुलिस द्वारा चलाए गए ऑपरेशन शिखर में माओवादियों ने जहां करीब चार हजार राउंड गोलियां चलायीं, वहीं कोबरा बटालियन, झारखंड जगुआर, सशस्त्र जिला बल के जवानों, पुलिस पदाधिकारियों एवं सीआरपीएफ के जवानों ने एके 47 रायफल से 2 हजार 171 राउंड, इंसास से 396 राउंड, एसएलआर से 158 राउंड तथा 9 एमएम पिस्टल से 25 राउंड गोलियां चलायीं। पुलिस फोर्स ने एके 47, इंसास, एसएलआर, 9एमएम पिस्टल, राइफल, ग्रेनेड, एसजी राइफल, यूडीजीएल आदि हथियारों का प्रयोग किया।

आज जहां नक्सलियों और पुलिस के मुठभेड़ के बाद गोलियों की केवल तड़तड़ाहट सुनाई दे रही है, उसी झुमरा पहाड़ी पर गुलाम भारत में उन्नत चाय की खेती होती थी। देश आजाद हुआ तो डालमिया उद्योग की ओर से बनने वाले अशोका ब्रांड पेपर के लिए यहां से बांस जाने लगा। चाय व बांस की खेती के लिए रामगढ़ समेत आस-पास के ग्रामीणों को मजदूरी करने के लिए यहां लाकर बसाया गया। कागज उद्योग बंद होने के बाद मजदूरी करने आए लोग यहीं बस गए। उस समय यहां रोजगार के साधन नहीं थे। फलस्वरूप लोग बकरी व मुर्गी पालन कर जीविका चलाने लगे। सड़क नहीं होने की वजह से ये बड़ी मुश्किल से नीचे आते थे। आजादी के बाद यहां विकास के नाम पर महज प्राथमिक विद्यालय व चेक डैम बनाए गए।

महाजनी प्रथा का विरोध कर यहां उग्रवादियों ने शुरूआती दौर में अपने पांव जमाएं। भौगोलिक स्थिति की वजह से सरकार की कोई विकास योजना यहां नहीं पहुंच पायी। नक्सलियों ने इसका फायदा उठाया और यहां अपना प्रशिक्षण केन्द्र बना लिया। वर्तमान में नेपाल के बड़े नक्सली नेताओं ने भी यहां प्रशिक्षण लिया। झारखंड व बिहार के नक्सलियों को यहां हिंसा का पाठ पठाया जाने लगा। 
बोकारो के तत्कालीन एसपी केएस मीणा सबसे पहले नक्सलियों के खिलाफ मोर्चा खोला। लेकिन पुलिस को उतनी सफलता नहीं मिल पायी। इसके बाद तत्कालीन एसपी तदाशा मिश्रा ने यहां तीस कंपनी फोर्स को लेकर चढ़ाई शुरू की। झुमरा पर पहली बार राज्य शासन के आला अधिकारी उस समय पहुंचे थे।

नक्सलियों के खिलाफ अभियान चला तो पुलिस का मनोबल बढ़ा। बतौर एसपी अनिल पालटा ने झुमरा को कई बार रौंदा। बाद में बतौर डीआइजी पालटा ने केन्द्रीय रिजर्व पुलिस बल का वर्ष 2006 में कैंप स्थापित कर दिया। बल ने यहां सिविक एक्शन प्लान के तहत कुछ विकास का काम भी किया। स्थानीय लोगों से सीआरपीएफ ने सब्जी समेत अन्य सामान खरीदना शुरू कर दिया तो उनकी कुछ आमदनी भी बढ़ गयी। कई बार यहां के गांव वालों ने सड़क बनाने का अनुरोध किया। लेकिन सड़क नहीं बन सकी। आज भी यहां के लोगों को बेहतर इलाज के लिए कई किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ती है।

गोमिया विधायक सह झारखंड राज्य धार्मिक न्यास बोर्ड के चेयरमैन श्री माधव लाल सिंह जी का मानना है कि झुमरा समेत आस-पास के इलाकों को उग्रवाद से मुक्त करने के लिए विकास जरूरी है। यहां सड़क, बिजली, शिक्षा व चिकित्सा का घोर अभाव है। खेती के लिए उपजाऊ भूमि है, लेकिन सिंचाई की कोई व्यवस्था नहीं है। लोग मेहनत से सब्जी की खेती करते हैं। लेकिन सड़क के अभाव में उसे बाजार तक नहीं पहुंचा पाते। विधान सभा में उन्होंने प्रश्न उठाया तो सरकार ने पंचमो में हाई स्कूल बनाने का भरोसा दिया। बहुत जल्द ही सड़क बनाने का भी काम शुरू कर दिया जाएगा।

अरविंद जी , बोकारो
(दैनिक जागरण से साभार)