Monday, 16 January 2012

झारखंड की गौरवशाली शिल्पकला ......




शिल्पकला की परंपरा भारत के इस पूर्वी क्षेत्र में झारखंड की सभ्यता-संस्कृति का गौरव है. झारखंड की शिल्पकला के काफ़ी उन्नत होने के बावजूद यहां के शिल्पकारों को उस तरह की प्रसिद्धि नहीं मिली, जिनके वे हकदार हैं. झारखंड की शिल्पकलाओं और शिल्पकारों की उन्नति के लिए झारखंड बनने के बाद सरकार की ओर से जिस तरह की सहायता की अपेक्षा की गयी, वैसा कुछ नहीं हुआ. इस कारण यहां की शिल्पकला को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जिस तरह का स्थान मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला. इन शिल्पकलाओं को जरूरत है, तो आर्थिक सहायता और प्रोत्साहन की. इसके अभाव में झारखंड की शिल्पकलाएं आज लुप्त होने के कगार पर हैं.
पारंपरिक काष्ठकला
राज्य की विभिन्न शिल्प कलाओं में लकड़ी के शिल्प (काष्ठकला) का महत्वपूर्ण स्थान है. आज इसे लोग भूलते जा रहे हैं. झारखंड के जंगलों में पहले लकड़ी भरपूर मात्रा में उपलब्ध हो जाया करती थी. लकड़ियों की उपलब्धता के कारण लोग काफ़ी संख्या में लकड़ी की वस्तुओं का निर्माण करते थे. वहीं आज लकड़ियों की किल्लत की वजह से लकड़ी की वस्तुएं कम बन रही हैं. झारखंड में बनी वस्तुओं के निर्माण में ज्यादातर अच्छी किस्म की लकड़ी का इस्तेमाल किया जाता है. लकड़ी से बनी वस्तुएं अपनी उपयोगिता और सुंदरता के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध है. अलमारी, दरवाजे और खिड़कियों पर सुंदर कलाकृतियां उकेरी जाती हैं. ये कलाकृतियां लकड़ी की सख्त सतह पर काफ़ी आकर्षक रूप से बनायी जाती हैं.

इसके अलावा घरों में रोजाना उपयोग में आनेवाली वस्तुओं का भी निर्माण लकड़ी से किया जाता है. लकड़ी के चम्मच, बक्से आदि भी बनाये जाते हैं. लकड़ी से बनी वस्तुओं की भारत के अलावा विदेशों में भी काफ़ी मांग है इसलिए झारखंड की लकड़ी शिल्पकला को बचाने और कारीगरों दक्षता लाने की जरूरत है. झारखंड में इस शिल्पकला को जिस तरह की पहचान मिली है वह इस शिल्प से जुड़े कामगारों के लिए पर्याप्त नहीं है. इसके लिए इन कामगारों को बाजार के अनुसार व्यवसायिक होने की जरूरत है. बाजारों में लकड़ी के बाजार भाव की जानकारी न होने की वजह से यह शिल्पकला उपेक्षित है. इस शिल्पकला को झारखंड सरकार की ओर से प्रोत्साहन की जरूरत है.
बांस शिल्पकला
झारखंड में जिस तरह के बांसों की प्रजातियां मिलती हैं, उससे यहां के शिल्पकारों द्वारा बनायी गयी बांस की वस्तुओं की अलग पहचान है. झारखंड की बांस की कला पूरे देश में अनोखी है. स्थानीय बांस से कुछ खास समुदाय के लोग नक्काशी करके बांस शिल्प का अच्छा नमूना पेश करते हैं. स्थानीय लोग बांस से टोकरियां, मछली पकड़ने और शिकार करने की वस्तुएं बनाते हैं. यहां की बांस की प्रजाति मोटी नहीं है, इसके बावजूद यहां के शिल्पकार इन बांसों में अद्भुत नक्काशी करते हैं. इस शिल्पकला पर यदि सरकार ध्यान दे, तो यह कला पूरे देश में विख्यात हो सकती है.
पैतकार पेंटिंग्स
पैतकार झारखंड के संस्कृति की एक महत्वपूर्ण कला है. यह कला मुख्यत: बंगाली समुदाय की देवी मनसा से जुड़ी हुई है. पैतकार यहां के समुदायों के सामाजिक मान्यता से जुड़ी हुई है. पैतकर पेंटिंग्स को झारखंड में स्थानीय लोग घुमावदार पेंटिंग्स के रूप से जानते हैं. इस पेंटिंग को उसे बनाये जाने की प्रकृति के अनुसार नाम दिया गया है. इस पेंटिंग में मनुष्य के मृत्यु के बाद के जीवन को विभिन्न रंगों के माध्यम से दर्शाया जाता है. इस पेंटिंग की हालत भी अन्य शिल्पकलाओं की तरह दम तोड़ रही है. इसकी खास वजह है कि इसे जानने वाले लोग इसके प्रचार-प्रसार में रूचि नहीं लेते. इस पुराने कला पर सरकार का ध्यान जाना चाहिए. इस वजह से पैतकार पेंटिंग कला को लोग भूल जायेंगे और यह इतिहास की बात बन जायेगी.
धातु कला
पूरे झारखंड में धातु कला सबसे ज्यादा प्रचलित है. यहां के धातु निर्मित औजार, हथियार और अन्य वस्तुएं उपयोग के लिए काफ़ी अच्छी मानी जाती है. धातु निर्माण का कार्य झारखंड के तेंतरी और मल्हार जाति के लोग ही करते हैं. धातु के वस्तुओं में हथियार, गहने, शिकार के औजार और खेती के औजार बनाये जाते हैं. गहनों के निर्माण के लिए शिल्पकार सोने और चांदी का उपयोग करते हैं. इस जनजाति के लोग धातु निर्माण के कार्य में अपनी उपयोगिता पूरे राज्य में साबित कर चुके हैं. धातु शिल्प के कार्यो में ज्यादातर आदिवासी लोग ही लिप्त हैं, इस कारण औद्योगिक नीति से अपने कला का प्रचार-प्रसार नहीं कर पा रहे हैं.
पत्थरों पर नक्काशी
यहां के कलाकार पत्थरों पर सुंदर कलाकृतियों का रूप उकेरते हैं. इनके कार्यो को पहचाने जाने की जरूरत है. किंतु यह इस कला का दुर्भाग्य ही है कि पत्थरों में नक्काशी को जरूरत के अनुसार सहायता और स्थान नहीं मिला है. राज्य में जहां-जहां पत्थरों पर नक्काशी के उदाहरण मिले हैं, वे अधिकतर स्थानीय आदिवासी समुदायों द्वारा बनाये गये हैं. इनके पास अच्छे उपकरणों और सरकार की ओर से प्रोत्साहन देने की जरूरत है. तभी पत्थर शिल्पकला नयी ऊंचाइयां छू पायेगी.
झारखंड के गहने
पारंपरिक झारखंडी गहनों का निर्माण आदिवासी समुदाय के लोग स्वयं करते हैं. गले, कान, नाक और हाथ में पहने जानेवाले गहनों का निर्माण वैसे तो सोने और चांदी से किया जाता है. इसके बावजूद यहां के लोग कीमती पत्थरों और मोती या मनकों से बने होते हैं. इनके द्वारा बनाये गये गहने आसानी से बनाये जाते हैं और इनको बनाने की विधि जटिल भी नहीं है. गहने बनाने की कला को यदि व्यावसायिक दृष्टि से प्रोत्साहन दिया जाये, तो यहां के गहने काफ़ी प्रचलित हो सकते हैं.
कठपुतली कला
झारखंड में लकड़ी से बने कठपुतली बनाने के लिए किसी खास वैज्ञानिक पद्धति की जरूरत नहीं पड़ती. इसे सामान्य तरीके से बनाया जाता है. कठपुतलियों को आकर्षक रंगों से बनाया जाता है. कठपुतलियों को रस्सी के सहारे हिलाया-डुलाया जाता है.
(प्रभात खबर से साभार )