Monday, 25 October 2010

बोकारो हवाई अड्डा से उड़ान भरेगे लोग

'यात्रीगण कृपया ध्यान दें!' , 'पटना जाने के लिए विमान तैयार है!' , 'आपकी यात्रा मंगलमय हो!' , कुछ इसी तरह की आवाज अब जिले के लोग बोकारो हवाई अड्डा पर सुन सकेंगे। जी हां! जल्द ही इस हवाई अड्डे से लोग निजी हवाई यात्रा कर सकेंगे। सबसे पहले एयर डेक्कन से उनकी यात्रा शुरू होगी। यह बोकारो के इतिहास में पहला मौका होगा, जब इस हवाई अड्डे से आम लोग हवाई यात्रा का लुत्फ उठा सकेंगे। बोकारो इस्पात नगर में हवाई अड्डा तो है। लेकिन अभी तक इसका उपयोग सार्वजनिक तौर पर नहीं होता है। बीएसएल के आला अधिकारी व राजनेताओं को यहां की सुविधा मिलती रही है। इसलिए आम लोग बोकारो हवाई अड्डे से दूर ही रहे।

लेकिन विकास की तीव्र रफ्तार ने बोकारो जिले की फिजा बदल दी है। यह जिला अब तेजी से इस्पात हब के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। इसलिए अब लोगों को हवाई यात्रा की भी जरूरत महसूस हो रही है। अभी तक लोग बोकारो से रांची जाकर ही हवाई यात्रा करते रहे है। जानकारी के मुताबिक समय की मांग के अनुसार अब बीएसएल प्रबंधन भी हवाई अड्डे के विस्तार की मूड में है। इस संबंध में एयर डेक्कन के साथ वार्ता जारी है। एयर ट्रैफिक व निजी हवाई यात्रा की तैयारी की योजना बनाई जा रही है। अगर सब कुछ ठीक-ठाक रहा तो बोकारो हवाई अड्डे का स्वरूप पूरी तरह बदल जाएगा। जल्द ही लोग एयर डेक्कन के जहाज पर हवाई यात्रा कर सकेंगे। लोग विकास के घोड़े पर बैठ कर अपने जीवन की रफ्तार को और तेज कर सकेंगे। हवाई अड्डे से निजी हवाई सेवा शुरू होने से यहां के लोगों को काफी लाभ होगा। वे सीधे तौर पर देश के अन्य शहरों से जुड़ जाएंगे। इससे बोकारो व देश के अन्य शहरों के बीच की दूरी कम समय में तय की जा सकेगी। साथ ही विकास की राह और भी आसान हो जाएगी।
(जागरण से साभार)

Monday, 20 September 2010

जा जा हो करम गोसांई..!

आदिवासियों का पारंपरिक पर्व करमा आज पूरे उत्साह व उमंग के साथ पूरे झारखंड में मनाया गया। यह पारंपरिक पर्व हरियाली का प्रतीक है। इस दिन प्रकृति की पूजा की जाती है। आज अपने पारंपरिक परिधान में आदिवासी ढ़ोल व मांडर की थाप पर थिरकते हैं। इस अवसर पर बहनें अपने भाईयों की लंबी उम्र व महिलाएं अपने पति के लिए कामना करती हैं। बहनें अपने भाईयों के लिए सुख व समृद्धि की चाहत रखती हैं।

कल अपराह्न् में सभी लोग जुलूस की शक्ल में ढ़ोल-नगाड़ों के साथ पूजा स्थल पर गए। सबलोग प्रकृति के रंग में रंगे हुए थे। नाचते-गाते सड़कों पर उन्मुक्त मन से प्रकृति की पूजा की गयी। राजधानी रांची समेत झारखंड के अन्य जिलों में इस पर्व को लेकर खासा उत्साह बना होता है। जगह-जगह पर शानदार सजावट देखने को मिली , बच्चों में भी खासा उत्साह है।


जा जा हो करम गोसांई, जा छोवो मास।
आवोतो भादरो मास, आनोबो घुराय॥
देलियो गे करमइती, देलियो आसीस गे।
तोर भइया जीयोतो, राखोतो रीति गे॥

जैसे गीतों के साथ चास-बोकारो के देहाती इलाकों में करमा पर्व की धूम थी। रविवार की रात जागरण किया गया। बहनों ने भाई की लंबी उम्र के लिए रात भर करम डाली के पास पूजा-अर्चना की। वहीं करम गीतों से अखाड़ा को जगाए रखा। बहनों का साथ भाइयों ने भी दिया। मांदर की थाप पर सभी थिरके।

झारखंड में इस पर्व की अलग महत्ता है। परन्तु इस वर्ष मानसून के दगा देने के कारण किसानों में खुशी नहीं दिखी। किसानों ने पुरानी परंपरा के कारण करमा पर्व को मनाया जरूर परन्तु बार-बार आसमान की ओर ताककर अपने-आप को कोसते नजर आए। यहां करमा को जावा पर्व भी कहा जाता है। यह त्योहार भाई-बहन के मधुर संबंध का प्रतीक है। झारखण्ड में इस दिन का बड़ा ही महत्व है। इस दिन बोये हुए बीज से उत्पन्न फसल रोगमुक्त और समृद्ध दिखती है।

वास्तव में करमा पर्व जीवन में कर्म के महत्व को बताता है। यह कर्म को पूजा-पाठ ओर धर्म से ऊपर रखता है। करमा पर्व विशुद्ध रूप से कृषि और प्रकृति से जुड़ा पर्व है। उन्होंने कहा कि करमा भाई-बहन के बीच प्यार व स्नेह का भी प्रतीक है। करमा पूजन की विधि की चर्चा करते हुए श्री उरांव ने कहा की करम गाड़ने के बाद कोठवार द्वारा समुदाय के लोगों को करम कथा सुनने के लिए बुलाया जाता है। श्रोता एवं उपासर अपने-अपने करम दौड़ या थाली में पूजन सामग्री तेल, सिंदूर, धूप-धुवन, खीरा, चीउड़ा, जावा फूल, अरवा चावल, दूध, फूल, फल सजाकर इसमें दीपक जलाते है। इसके सारू पत्ते से ढककर अखाड़ा में लाते है और करम के चारों ओर बैठ जाते है। दूसरी ओर करम अखाड़ा में चारों ओर भेलवा, सखुआ या केंद इत्यादि लाकर खड़ा कर दिया जाता है। कथा अंत होने के बाद प्रसाद वितरण किया जाता है। युवक-युवतियां करमा नृत्य संगीत प्रस्तुत करती है। दूसरे दिन सुबह भेलवा वृक्ष की टहनियों को धान की खेती में गाड़ दिया जाता है। ऐसा माना जाता है कि इससे फसल फसल में कीड़े नहीं लगते है। श्री उरांव ने कहा कि करमा अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग विश्वास एवं मान्यता के साथ मनाया जाता है।

- बहनों ने रखा नौ दिन तक व्रत
मनसा पूजा समाप्त होते ही करम गीत की शुरूआत हो जाती है। इस त्योहार में बहनें भादो माह के शुक्ल पक्ष में तृतीया से एकादशी तक व्रत रखती है। बांस की बनी छोटी-छोटी टोकरी जिसे कुड़माली में 'टुपा-डाली' कहते है। इसे लेकर युवतियां जलाशय, झरना, नदी अथवा तालाब में जाकर स्नान के बाद बालू भरकर उसमें नौ तरह के तेलहन-दलहन के बीजों को बोती हैं। डाला के बीचों-बीच एक सखुआ की खूंटी गांव के मालिक महतो परिवार की युवती गाड़ती है। इस खूंटी को मूल खूंटी (महतो खूंटी) के नाम से जाना जाता है। डाला के मूल खूंटी के चारों ओर अधिक-से-अधिक नौ खूंटी गाड़ी जाती है। जो नवग्रह एवं बीच की खूंटी को सूर्य का प्रतीक माना जाता है। नदी के किनारे से गांव के करम अखाड़ा तक आते वक्त नौ स्थान पर इस डाला को रख कर चारों ओर से नाच-नाच कर युवतियां करम गीत गाती है।

- 'नाया' ने गाड़ी करम डाली
व्रत करने वाली नवयुवती एवं महिलाएं दूध, दही, गुड़, नमक एवं साग नहीं खाती है। एकादशी की रात में एक करम पेड़ की डाली को करम अखाड़ा में गांव के 'नाया' ने गाड़ा। वहीं रात को महिला-पुरुष, युवक-युवतियां नाच-गान के द्वारा अखाड़ा को जगाए रखा। करम डाली से बहन अपने भाई के दीर्घायु होने की कामना को लेकर दोड़ी एवं बेना से निर्मित अतिसुन्दर कांगन करम डाली में बांधा। आज इस कंगन को भाई के बांहों में बांधा जाएगा।

-आज होगा जावा डाली का विसर्जन
रात भर अखाड़ा को जगाए रखने के बाद आज द्वादश की सुबह बहनें विभिन्न गीतों के साथ जावा डाली का विसर्जन करेगी। बहनें अपने-अपने क्षेत्र के जलाशयों में विसर्जन करने के बाद व्रत तोड़ेगी।

( जागरण से साभार )

Wednesday, 25 August 2010

नेतरहाट आवासीय विद्यालय नामांकन घोटाले में बोकारो भी शामिल

कभी एकीकृत बिहार और अब झारखंड का गौरव कहा जानेवाला नेतरहाट आवासीय विद्यालय नामांकन घोटाले को लेकर चर्चा में है। कुल 100 सीटों के लिए हुई प्रवेश परीक्षा में 48 बच्चे फर्जी तरीके से परीक्षा पास किया है। जिसका प्रमाण झारखंड एकेडमिक काउन्सिल को मिला है। इन 48 बच्चों में से राँची के 37 और बोकारो के 11 बच्चे है।

प्रवेश परीक्षा के प्रकाशित परिणाम में से कुल ग्यारह छात्र कुर्मीडीह होली पब्लिक स्कूल के ही चयनित हो गए। इसमें कई छात्र रांची में रहते थे लेकिन नेतरहाट प्रवेश परीक्षा कुर्मीडीह होली पब्लिक स्कूल से दी। मामले पर अधिविद्य परिषद की नजर पड़ी व जांच का सिलसिला चल पड़ा। जब परिषद के संयुक्त सचिव ए के मल्लिक विद्यालय पहुंचे तो सब कुछ साफ हो गया कि चयनित छात्रों में से एक भी इस विद्यालय के नहीं हैं। न ही प्रधानाध्यापक ने उनका फार्म अग्रसारित कराया है। ऐसे में परिषद ने 18 अगस्त को सभी उत्तीर्ण छात्रों एवं प्रधानाध्यापक को परिषद कार्यालय में मूल प्रमाण पत्रों के साथ उपस्थित होने का निर्देश दिया था।

विभिन्न छात्र संगठन प्रतिनिधियों ने गुरुवार को जिला शिक्षा प्रबंधन से भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प लिया। रांची विवि के जनजातीय व क्षेत्रीय भाषा विभाग में हुई बैठक में एनएसयूआई, जेसीएम, जेसीएस, जेवीसीएम, आजसू व आमसा के प्रतिनिधियों ने कहा कि नेतरहाट नामांकन घोटाले का केंद्र जिला शिक्षा कार्यालय है।छात्र नेताओं ने डीईओ कार्यालय के अधिकारियों व कर्मचारियों की संपत्ति की जांच कराने की भी मांग की।


झारखंड एकेडमिक काउन्सिल ने सभी 48 बच्चों के नामांकन को रद्द करने का फैसला किया है । झारखंड एकेडमिक काउन्सिल का मानना है कि इस घोटाले में कई पदाधिकारी के साथ साथ विद्यालय के प्रिंसिपल दोषी है। काउन्सिल को यह भी आशंका है कि नामांकन घोटाला काफी पहले से चलता आ रहा है। जैप ने इसकी जाँच कराने का भी निर्णय लिया है।

Monday, 23 August 2010

डीपीएस बोकारो की प्राचार्या हेमलता एस मोहन झारखंड राज्य महिला आयोग का अध्यक्ष बनीं !!

डीपीएस बोकारो की प्राचार्या हेमलता एस मोहन को झारखंड राज्य महिला आयोग का अध्यक्ष बनाया गया है. लक्ष्मी सिंह का कार्यकाल सितंबर 2009 में पूरा होने के बाद से यह पद रिक्त था.

वहीं समाजसेवी व वरिष्ठ पत्रकार वासवी किड़ो और रांची वीमेंस कॉलेज की प्रोफ़ेसर इंचार्ज व इतिहास की शिक्षिका डॉ जीनत कौशर
, रांची विवि स्नातकोत्तर हिंदी विभाग की पूर्व अध्यक्ष व पूर्व कुलपति स्वर्गीय डॉ एके धान की पत्नी डॉ मंजु ज्योत्सना तथा सिल्ली छोटामुरी की रहनेवाली अनुराधा चौधरी को आयोग का सदस्य बनाया गया है.

राज्यपाल एमओएच फारूक के निर्देश पर समाज कल्याण विभाग द्वारा अधिसूचना जारी कर दी गयी है. डॉ जीनत कौशर को नीलांबर-पीतांबर विवि डालटनगंज में प्रतिकुलपति बनाया गया था
, लेकिन उन्होंने योगदान नहीं किया.
(प्रभात खबर से साभार)
उन्‍हें बहुत बधाई और शुभकामनाएं !!

Thursday, 5 August 2010

बोकारो में क्वींस बैटन का भव्य स्वागत

कामनवेल्थ गेम्स को लेकर निकली मशाल क्वींस बैटन  के बोकारो आगमन से पहले ही इसका विरोध शुरू हो गया था। कई दिन पूवर्क्वींस बैटन विरोधी मंच के बैनर तले चास स्थित धर्मशाला मोड़ पर सदस्यों ने धरना देकर अपने विरोध का इजहार किया था । धरना देने वालों का विचार था कि क्वीन नाम होने से बैटन का स्वागत भारतमाता के वीर शहीदों का अपमान है। उन्होंने इसे पूरी तरह से औचित्यहीन बताया था। मंच के सदस्यों ने प्रशासनिक अधिकारियों को पत्र के माध्यम से कहा था कि इसका नाम बदल कर किसी राष्ट्रपुरोधा के नाम पर किया जाए। धरने में अनिल कुमार गुप्ता, राजेंद्र महतो, धर्मवीर, वाहिद खान आदि मौजूद थे। 

पर आज क्वींस बैटन धनबाद होते हुए जब बोकारो पहुंची , तो इसका भव्य स्वागत किया गया। जिले के उपायुक्त डा. नितिन मदन कुलकर्णी और पुलिस कप्तान साकेत कुमार सिंह ने बैटन को थामा।बोकारो पहुंचने पर बैटन का भव्य स्वागत किया गया। बड़ी संख्या में खेलप्रेमियों की मौजूदगी रही। इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग सड़क के दोनों ओर खड़े थे। स्कूली बच्चों ने स्वागत गान गाया। क्वींस बैटन के स्वागत में बोकारो के रुटों को काफी शानदार ढंग से सजाया गया था।




क्वीन्स बेटन रिले का स्वागत स्कूली बच्चों ने निराले अंदाज में गीत व नृत्य के माध्यम से किया। बोकारो क्लब के सभागार में संगीत संध्या का आयोजन किया गया। बीआईवी दो ए के विद्यार्थियों ने आदिवासी नृत्य पेश कर राज्य की माटी की खुशबू बिखेर दी। इसके बाद दिल्ली पब्लिक स्कूल बोकारो के बच्चों ने बेला बिहस गए., आया है लाया उत्साह और खुशहाली शेरू ने भर., बीएसएल स्कूल के बच्चों ने धन्य-धन्य झारखंड की धरती., संगीत कला एकेडमी की बच्चियों ने फीफा व‌र्ल्ड कप की थीम पर आधारित नृत्य, केवी एक के बच्चों ने धींग धापा धैरिया बाजे मांदर आखरा.गीत पर समूह नृत्य पेश कर क्वीन्स बेटन टीम के सदस्यों को झूमने पर मजबूर कर दिया। कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय की बच्चियों ने हरियाणा के लोक गीत पर नृत्य प्रस्तुत किया। 

रिले टीम के स्क्वार्डन लीडर कमल चौधरी ने क्वीन्स बेटन की खासियत का वर्णन किया। कार्यक्रम का संचालन संचार, प्रमुख संजय तिवारी ने किया। अंत में उपायुक्त डा.कुलकर्णी एवं बीएसएल के प्रबंध निदेशक शशि शेखर महांती ने बेटन बियरर्स एवं आला अधिकारियों को सम्मानित किया। इस अवसर पर बीएसएल एवं जिला प्रशासन के अलावा टीम में शामिल अधिकारी व सदस्य उपस्थित थे। कामन वेल्थ गेम्स के शुभंकर शेरू ने भी मंच पर नृत्य का जादू बिखेर दिया। शेरू की तस्वीर कैमरे में कैद करने के लिए लोग खासे उतावले हो रहे थे। कई लोग शेरू के साथ ताल पर ताल मिला कर नाच कर रहे थे।



क्वींस बैटन के स्वागत को रांची भी पूरा तैयार है। क्वींस बैटन कल सुबह राजधानी रांची आ रही है। इसके स्वागत के लिए राजधानी पूरी तरह से तैयार है। रांची की सीमा चुटुपालू में प्रवेश करने के बाद क्वींस बैटन जिला प्रशासन के हाथों में होगा। इसके बाद बैटन को बूटी मोड़ स्थित झारखंड वार मेमोरियल लाया जाएगा। वहां पर झारखंड ओलंपिक एसोसिएशन को प्रशासन बैटन सौंप देगा। 


रांची के जिलाधिकारी केके सोन ने बताया कि रास्ते में राजभवन, बिरसा चौक और मोरहाबादी के समीप गांधी जी की प्रतिमा के सामने इसका समापन होगा। कल शाम सांस्कृतिक कार्यक्रम भी पेश किए जाएंगे। सात अगस्त को खेलगांव से निकलकर बैटन टाटीसिल्वे व नामकुम होते हुए जमशेदपुर चली जाएगी। इस दौरान रांची में यातायात की मुकम्मल व्यवस्था की गई है। यातायात एसपी बिगलाल उरांव ने बताया कि राजधानी में बैटन रुट में बड़ी संख्या में यातायात पुलिसकर्मियों को तैनात किया जाएगा।



क्वींस बेटन रिले के आगमन पर जहां चास नगर पार्षद की ओर से स्वागत कर रही थींवहीं चास नपा उपाध्यक्ष मो वाहिद खान क्वींस बेटन का विरोध कर रहे थे. यह घटना एक ही साथ अलग-अलग चास में ही घटी. चास नपा अध्यक्ष गंगा भालोटिया नील कमल होटल के सामने क्वींस बेटन रिले का जोरदार स्वागत कियातो चास के नेताजी सुभाष चंद्र चौक पर चास नपा उपाध्यक्ष मो वाहिद खान ने क्वींस बेटन रिले का विरोध करते हुए गिरफ्तारी दी. चास थाने में गिरफ्तार चास नपा उपाध्यक्ष ने कहा कि क्वींस बेटन का भारत भ्रमण हिंदुस्तान का अपमान हैइसलिए वे इसका विरोध कर रहे हैं. उन्होंने कहा कि जिन अंग्रेजों के शासन काल में भारत गुलाम रहाउसी देश की महारानी क्वींस बेटन के नाम पर देश में आज बेटन का भ्रमण हो रहा है और भारतवासी उसका स्वागत कर रहे हैंयह उचित कदम नहीं है.

(दैनिक भास्‍कर से साभार)

Sunday, 18 July 2010

अब बोकारो में ऑनर किलिंग .....

झारखंड में कोडरमा की रहनेवाली पत्रकार निपमा की मौत का मामला अभी सुलझा भी नहीं था कि बोकारो में भी ऑनर किलिंग की घटना दोहरायी गयी.
12 वीं का छात्र विराट विद्या उर्फ गोलू की उसकी प्रेमिका के भाइयों ने मिल कर हत्या कर दी. पुलिस ने गोलू की प्रेमिका नुपूर के चारों भाइयों को गिरफ्तार कर लिया है. चारों भाई राकेश कुमारमिंटू बाउरीविक्रांत जैकी व रवि ने घटना में अपनी संलिप्तता स्वीकार कर ली है.

बोकारो में पढ़ाई करता था
गोलू चिकित्सक डॉ एम लाल के सेक्टर चार थाना क्षेत्र स्थित सेक्टर चार सी/
2030 आवास में रह कर पढ़ाई करता था. वह बेगूसराय (बिहार) का मूल निवासी था.  गोलू के पिता कोडरमा में बैंक ऑफ़ इंडिया में हैं. शनिवार सुबह इसी आवास से उसका शव मिला. शरीर पर चोट के निशान थे. सूचना मिलते ही पुलिस घटनास्थल पर पहुंची. जांच के दौरान मामला प्रेम प्रसंग का पाया गया.

सेक्टर चार थाना पुलिस ने उसकी प्रेमिका नुपूर के चारों भाइयों को हिरासत में लेकर पूछताछ की. पुलिस के अनुसार
नुपूर के भाइयों ने पीट-पीट कर गोलू को मार डाला. नुपूर के सामने ही गोलू की पिटाई की गयी. बचाने गयी नुपूर को भी उसके भाइयों ने पीटा. चारों को चास जेल भेज दिया गया है.

मामा और मामी पहुंचे
सूचना मिलने के बाद गोलू के मामा हजारीबाग में पुलिस लाइन के मेजर राजीव कुमार अपनी पत्नी के साथ बोकारो पहुंचे. उन्होंने सेक्टर चार थाने में प्राथमिकी दर्ज करायी है. प्राथमिकी में राकेश कुमार बाउरी
विक्रांत उर्फ जैकीरवि बाउरी व मिंटू बाउरी को नामजद अभियु बनाया गया है.
('प्रभात खबर' के सौजन्‍य से)

Monday, 12 July 2010

रोहन में बीज डालने के बाद फसल में कीड़े नहीं लगते है !!

बोकारो जिले के कसमारपेटरवार और जरीडीह समेत आस-पास के क्षेत्र में मंडरा रही दुर्भिक्ष की काली छाया को देख कर किसानोंमजदूरों एवं आम जनता में त्राहिमाम की स्थिति उत्पन्न हो गयी है. खेती किसानी की परंपरागत तकनीक पर विश्वास करें,तो रोहन यानी रोहिनी नक्षत्र के प्रवेश करते ही किसान अपने-अपने खेतों में धान के बीज डाल देते थे. इसमें यह मान्यता है कि रोहन में बीज डालने के बाद फसल में कीड़े नहीं लगते है. पिछले कई वषरे से लगातार सुखाड़ की मार ङोल कर किसानों की कमर टूट चुकी है.

इस वर्ष भी  स्थिति कुछ ऐसी ही है. मॉनसून का प्रवेश तो धमाकेदार हुआ
लेकिन दो दिन बूंदा-बांदी कर ऐसा रुठा कि वापस आने का नाम ही नहीं ले रहा है. गांव में किसान रोज पूजा-पाठ कर  इंद्र भगवान को प्रसन्न करने की कोशिश में  जुटे है. बारिश भले ही न हो,लेकिन बादल रोज आसमान में उमड़ रहे है. इधर देर-सबेर बिहन डालने के बाद धान के बीचड़े जो खेतों में उग आये थे. उसकी हरियाली पर अब धीरे-धीरे पीलापन की परत चढ़ने लगी है. ऐसे में क्षेत्र के किसानों में संशय की स्थिति उत्पन्न हो गयी है.

इसके अलावा इस वर्ष वर्षा के आभाव में एवं तेज गरमी से प्राय सभी परंपरागत सिंचाई के साधन नदी-नाले तालाब
डांडी व कुएं सूख गये है.खत्म हो गये है धान के परंपरागत बीजआज से 15-20 वषरे पूर्व तक जो भी किसान खेती करते थेवो परंपरागत बीजगोबर से बना खाद व खेती-बारी की सारी व्यवस्था पूर्णत देशज विधि पर निर्भर थी.

हाल के वषरे में खेती पर नयी तकनीक व हाइब्रिड के बीजों का समावेश होता गया. वैसे ही हमारे परंपरागत बीज
खाद व देशज पद्धति प्राय समाप्त ही हो गये हैं. खास कर क्षेत्र के किसानों के पास  उस वक्त सौ से अधिक किस्म के धान के बीज बचे थे. लेकिन वर्तमान समय में अब एक भी प्रकार के धान के परंपरागत बीज उनके घरों में नहीं है. आज की खेती किसानी पूर्णत बाजार पर निर्भर है.

खत्म होनेवाले धान के परंपरागत बीज खत्म होनेवाले धान बीजों के  नाम हैं - हथिया साइल
,बाघ पांजरकोया धानडैडकी साइललाल मोटा धानहरदी साइलजोंग धानसोना धूसरी,कारी बाकीगोविंद भोगसमुद्री धानसीता साइलकुमरा साईलझिंटी साइलखैरका खोची,चरकी राइसकरहनीजोनरा साइलमालयर धानप्रसाद भोगबादशाह भोगबरहा साइलकतकी साइलपूर्वी साइल.
(प्रभात खबर के सौजन्‍य से )

Tuesday, 8 June 2010

बोकारो जिले का नक्‍शा

इसे बडे रूप में देखने के लिए इसे दूसरे विंडों में खोलें  .......


Bokaro District Map

Monday, 7 June 2010

हमारा जिला बोकारो : एक परिचय

बोकारो झारखंड राज्‍य के 24 जिलों में से एक है। बोकारो जिला मुख्यालय स्थित बोकारो इस्पात नगर 23.29 आक्षांश और 86.09 देशान्तर पर है । बोकारो जिला का सम्पूर्ण भौगोलिक क्षेत्रफल 2861 वर्ग कि.मी. और 35766.36 हेक्टेयर की भूमि पर फैला हुआ है । यह दामोदर नदी के दक्षिणी हिस्से में पारसनाथ की पहाड़ियों के बीच स्थित है। 1991 में धनबाद जिले से दो ब्‍लॉक और गिरिडीह जिले से छह ब्‍लोकों को काटकर इस जिले को मूर्त रूप दिया गया। बोकारो स्‍टील सिटी इसका जिला मुख्‍यालय है। 2001 की जनगणना के अनुसार इस जिले की जनसंख्‍या 17,75,961 है। यह 2861 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है। इसकी समुद्र तल से औसत ऊंचाई 210 मीटर है। दामोदर नदी के कारण यहां के उद्योगो और औद्योगिक नगरों को पानी की आपूर्ति होती है। पूरे झारखंड में छोटी बडी अनेक पहाडियां हैं। 



वर्ष 1968 में तत्कालीन प्रधानमंत्री स्व.इंदिरा गांधी ने जिस सोच के तहत बोकारो में स्टील प्लांट के साथ विकास की नयी बुनियाद खड़ी थी। आज उसी बुनियाद पर औद्योगिक उन्नति की नई-नई इमारतें खड़ी होती जा रही हैं। कभी पहाड़, जंगल-झाड़ियों के बीच बसा यह जिला आज विकास के नये आयाम की ओर काफी तेजी से अग्रसर होता दिख रहा है। सेल (स्टील अथॉरिटी आफ इंडिया लिमिटेड) के द्वारा बोकारो में एक बडा स्‍टील प्‍लांट लगाया गया है। यहां अन्‍य छोटे बडे उद्योग भी हैं। भारत के औद्योगिक नक्‍शे में यह क्षेत्र प्रमुखता से दिखाई देता है। इधर दुनिया की सबसे बड़ी इस्पात निर्माता कम्पनी आर्सेलर-मित्तल ने वर्ष 2005 में किये गये एमओयू के आलोक में जिले के पेटरवार व कसमार में 12 मिलियन टन का स्टील प्लांट लगाने की घोषणा कर क्रांतिकारी पहल की शुरुआत कर दी है।



बोकारो जिले में 8 ब्‍लॉक हैं , जिनके नाम इस प्रकार हैं .... बेरमो , चास , चंदनक्‍यारी , गोमिया , जरीडिह , कसमार , पेटरवार और नावाडीह। यहां घूमने के लिए उपयुक्त मौसम  सितंबर से फ़रवरी तक है। बोकारो जेनरल अस्पताल शहर या जिले का सबसे अच्छा अस्पताल है.यहां साक्षरता का प्रतिशत अच्‍छा है। खासकर बोकारो स्‍टील सिटी के प्रतिभाशाली छात्र डॉक्‍टर , इंजिनियर बनकर और अन्‍य महत्‍वपूर्ण पोस्‍टों पर सुशोभित होकर देश विदेश में यहां का नाम रोशन कर रहे हैं। 

Sunday, 7 February 2010

अब आधुनिकता के चक्‍कर में बोकारो भी आ गया है !!

वैसे तो पूरा झारखंड ही प्राकृतिक संपदाओं से परिपूर्ण है , इसलिए बोकारो का महत्‍व तो है ही । इस सदी के उत्‍तरार्द्ध में हुए औद्योगिकीकरण ने बोकारो को भले ही एक नई पहचान दी हो , पर इस क्षेत्र के लोगों को कभी भी रोजी रोटी की समस्‍या से नहीं जूझना पडा। पुराने जमाने में जहां एक ओर यहां के खेत और बगान ग्रामीण गृहस्‍थों की जरूरत को पूरा करने में समर्थ होते थे , वहीं यहां के घने जंगल आदिवासियों की जरूरत भी। यही कारण है कि यहां के लोगों को कभी भी अपनी रोजी रोटी के लिए पलायन नहीं करना पडा।

ऐसा भी नहीं कि यहां के खेत की मिट्टी बहुत ही ऊपजाऊ है , जो वर्षभर में कई फसल दे देती है। इस जिले में रबी की फसल तो होती ही नहीं , सिर्फ एक धान की खेती पर ही सबको गुजारा करना पडता है। बारिश अधिक होने के कारण एक फसल होना तो लगभग तय ही है। पहाडी क्षेत्र होने के कारण कुछ खेत काफी गहरे हैं , जो थोडे पानी में भी भर जाते हैं। अनावृष्टि के समय में भी उनसे कुछ फसल की उम्‍मीद हो जाती है। इसके लिए भी हर वर्ष खेत में खाद डालना आवश्‍यक होता है। वर्षभर के खाने का चावल हो जाए , तो साग, सब्‍जी या दलहन लोग अपने बागानों में ही लगा लेते है, जिसे सिंचाई के द्वारा भी उपजाया जा सके और इस तरह अपनी जरूरतों की पूर्ति करते हैं। अब तो चावल की बिक्री कर लोग गेहूं भी खरीदकर खाने लगे हैं।

गाय, बैल और बकरी पालना भी यहां बहुत कठिन नहीं होता और खानेभर दूध , दही के लिए लोगों को कोई दिक्‍कत नहीं होती। यहां छोटे नस्‍ल के मवेशी पाए जाते हैं , जिनको बांधकर संभालने की जिम्‍मेदारी दो तीन महीने की खरीफ के फसल के समय में ही होती है। बाकी समय तो यहां के मवेशी खेतों में खुले घुमते रहते हैं और घास वगैरह खाकर आराम से घर वापस आ जाते हैं। वैसे दो चार चरवाहे सारे गांव या मुहल्‍ले के मवेशियों को ले जाकर दिनभर जंगल से घुमाकर ले आते है।  इस तरह उन्‍हें खिलाने पिलाने और साफ सुथरा करने की जिम्‍मेदारी बहुत थोडी होती है। जलावन के लिए पहले लोग जंगल की लकडी और कुछ दिन बाद कोयले का प्रयोग करने लगे।

यहां की जमीन बहुत ही पथरीली है , ऊपर के डेढ फुट ,जिसका उपयोग खेती के लिए किया जाता है , वो कुछ ठीक है, क्‍यूंकि उसमें भी रेत की बहुत मात्रा होती है। नीचे की जमीन इतनी कडी है कि पेडों की जडें भी अधिक अंदर न जाकर चौडाई में फैलती हैं। इसलिए आंधी और तूफान में बहुत पेड गिर भी जाते हैं। पर यहां की मिट्टी से बननेवाले घर भी बहुत मजबूत होते हैं , पक्‍के मकान में भी नींव कम डालने की आवश्‍यकता होती है। यहां तक कि स्‍थानीय पद्धति से ईंट बनाकर मिट्टी से उन्‍हें जोडते हुए दीवाल तैयार कर सिर्फ छत की ढलाई में छड और सीमेंट का प्रयोग करते सामान्‍य लोग भी पक्‍के का मकान बना लेते हैं।

यहां पहले गर्मी अधिक नहीं पडती थी ,बरसात और ठंड खूब पडता था, अब मौसम में कुछ परिवर्तन आया है।यहां के लोग बहुत सीधे सादे और संतोषी होते हैं , जाति पाति और धर्म के संघर्ष की अधिक कहानियां इधर सुनने को नहीं मिलती हैं। सब रूखा सूखा खाकर भी संतुष्‍ट रहने की कोशिश करते हैं। पुरूषों की अपेक्षा यहां की महिलाएं अधिक मेहनती होती हैंऔर घर को चलाने में उनकी भूमिका मुख्‍य होती हैं। तिलक , दहेज या अन्‍य कुरीतियों का प्रचलन बहुत कम है , यहां नारियों को बहुत सम्‍मान मिलता है। लेकिन आधुनिकता के चक्‍कर में अब बोकारो भी आ गया है और कई कुरीतियां देखने को मिल रही हैं।